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Yaadon ki Nirjhari – यादों की निर्झरी


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यादों की निर्झरी 

हम सब एक दुसरे को भूल तो जायेंगे
पर बीते हुए पल एक दिन फिर याद आयेंगे
वो हँसना  वो रोना
कुछ पाना  कुछ खोना
वो चुटकुलों की मस्ति
वो कागज़ की कश्ति
वो साथ बैठ कर खाना
कभी रूठना कभी मानना
वो मुश्किल लम्हों में साथ निभाना
और कन्धों पे हाथ रख के दिल को छु जाना
वो धामा चोकड़ी मचाना
और साथ बैठ कर गाने गाना
वो पत्तों के खेल
वो स्वादिष्ट से भेल
वो पकड़ पकड़ के सबको दावत पे बुलाना
और खाना माँगा के खुद खा जाना  

जब टूटा हो दिल तो साथ बैठ कर समझाना
और हंसी में शामिल हो सब भूल जाना
वो बात बात पर सबकी उड़ना
पर बुरा मान जाने प् उतनी शिद्दत से मानना
वो डांस फ्लोर पे उलटे सीधे करतब दिखाना
और सामने वाले को देख के हँसते हँसते लोट पॉट हो जाना
वो हर बार मिलने पे फोटो खिंचवाना
और फेसबुक पे अपलोड कर कमेंट करवाना

हाँ वो दिन थे कभी जो लौट के न वापस आयेंगे
पर नए दिन शायद फिर वही बहार लायेंगे
पर दोस्तों तुमको हम कभी न भूल पाएंगे
हाँ जाते जाते इतना ज़रूर कह के जायेंगे
की दावत तुमको अभी बाकि है देना
ग़ोल्गप्प जलेबी के हमसे पैसे न लेना
फिर वो हंसी के फुवारे तुम देखो
और ख़ुशी के फूल रोज़ इधर उधर फेंको

पर याद पता नहीं इतनी क्यूँ आती है
जबकि मालूम है ज़िन्दगी चलती जाती है
उन लम्हों को संजो कर रख तो लिया है मैने
पर हर पल मन क्यूँ फिर चाहता है ये कहने
की आओ फिरसे वो महफ़िल साथ जमये
ठहाको की फुलझड़ी फिर से मिलके जलये
इस दौड़ती ज़िन्दगी को थाम  ले ज़रा
दोस्ती की चाशनी में फिर घुल मिल जाएँ
और बनाये नयी यादें जिन्हें भूलना मुश्किल हो
और यादों में नयी यादें फिर से शामिल हो
पर जो शुरू होता है वो एक दिन तो जाना है
शायद उन लम्हों को वापस फिर नहीं आना है
आगे जो मिलेगा उसी का साथ निभाना है
हँसते हँसते ज़िन्दगी जीते चले जाना है
कभी हँसाना कभी तो रुलाना है
फिर से कुछ नए दोस्त हमें फिर से बनाना है

पर हाँ भूलना नहीं है उनको जिन्होंने गुलशन हमारा आबाद किया
धीरे धीरे हर एक फूल को बोया और सब कुछ निखार  दिया
वो दोस्त ही थे जो बैठे थे मेरे साथ
जब मुझे लगा की ज़िन्दगी में रह ना गयी  वो बात
वो दोस्त ही होंगे जिनको  याद कर ख़ुशी होती है
कभी फिर से उनसे वो दावत की उम्मीद होती है

कहने को तो है बहुत पर कितना ही मैं लिख पऊंगा
ये कहानी ऐसी है जिसे मैं न कभी पूरा करना चाहूँगा
क्यूंकि हो गयी जो पूरी तो उम्मीद ख़तम हो जाएगी
ये दोस्ती ऐसी चीज़े है हो ता उम्र साथ निभाएगी

— शुभंशु मिश्रा 

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7 responses to “Yaadon ki Nirjhari – यादों की निर्झरी

  1. Sneha Singh November 26, 2012 at 1:23 pm

    This poem is “very good”. I was yearning for reading somthing in Hindi for so long.

    Some modification might be entertained:
    para1, line 8th: “मनाना” instead of “मानना” rhymes much better.

    para 1, last line: Typo: “मंगा” in place of “माँगा”.

    para 2, line 3: “उड़ाना” instead of “उड़ना” rhymes much better.
    para 2, line 4: again.. “मनाना” instead of “मानना”.

    para 3, line 6: “ग़ोल्गप्पे” in place of “ग़ोल्गप्प”

    similarly,
    para 4, line 5: “जमाये” for “जमये”
    para 4, line 6: “जलाये” for “जलये”

    the last line: meaning?

    again well done 🙂 and i will try to reduce my comments in future, as i dont want to seem too pedantic.

    • NapsterNXG November 26, 2012 at 1:50 pm

      Haha once again thanks for the details in your comment. The reason I wanted critical comment was because I want to see the errors I am making, no matter how small they are. Small mistakes once improved lead to masterpieces. Would correct the typos soon =D

  2. Anand Choudhary November 24, 2012 at 8:42 am

    Its really good….sare summary 5 sal ka bta diya aapne…….i hope to use my time more effectively with my friends now

  3. Vivek Shukla November 23, 2012 at 7:01 am

    its awesome dude …a continuous flow of feelings with thoughts. Once you go through the first line , its hard to stop and it feels like re-living “wo din” …great work !!!

  4. Saurabh Tiwari (@_neo7) November 23, 2012 at 6:26 am

    I find this poem very relaxing and comforting, the last paragraph make me feel super excited about a never ending relationship.
    Great work man. People like you are hard to find. 🙂

  5. Ankit Jain November 23, 2012 at 6:19 am

    Makes me nostalgic, forces remembrance, and the best part I feel: simple words that connect to people …. Great effort Shubhanshu! 🙂

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